प्रतिबंध के बावजूद आखिर कैसे बिक रही विदेशी मांगुर ?

काशी के रास्ते पूर्वान्चल के कई जिलों में भेजी जा रही प्रतिबंधित मछलियों की खेप

डाँ.लोकनाथ पाण्डेय

वाराणसी। प्रतिबंधित मछलियों के व्यापार व अवैध वसूली ने मुख़्तार गैंग के जुड़े होने की बात सामने आई तो जिला प्रशासन ने विगत दिनों बड़ी कार्रवाई कर कुछ लोगों को जेल अवश्य भेज दिया। चन्द दिनों बाद मामला ठंडा होते ही एक बार फिर प्रतिबंधित मांगुर मछलियों का कारोबार परवान चढ़ गया है। पुरानापुल, शिवाला, चौकाघाट, भोजूबीर, सुंदरपुर, डीएलडब्ल्यू चौराहा, बंगाली टोला समेत तमाम छोटी बड़ी मछली मंडियो में शाम को आज भी धड़ल्ले से प्रतिबंधित मांगुर बेचीं जा रही। छोटे दुकानदारों का कहना है कि आज भी सामान्य ग्राहक सबसे ज्यादा इसी मछली की डिमांड करते है। इन दुकानदारों को पकड़े जाने का डर तो है लेकिन चन्द रुपयों की लालच में इन्हें धंधा करना पड़ता है।

हैदराबाद से ढाका तक फैला है नेटवर्क

सूत्रों ने बताया कि नदेसर स्थित एक कालोनी से इसका स्थानीय नेटवर्क चल रहा। शहर का पुरांना मछली व्यवसायी व उसके गुर्गे आज भी इस धंधे से सीधे जुड़कर खूब चांदी काट रहे है। पूरा मामला देखें तो यह लोग इस धंधे के छोटे मोहरे भर है। सूत्रों की मानें तो यह पूरा नेटवर्क हैदराबाद दिल्ली कोलकाता से लेकर ढाका बंग्लादेश तक फैला हुआ है। विभागीय मिलीभगत व चन्द सिक्कों के बलपर भारत में प्रतिवर्ष कई लाख टन विदेशी मांगुर मछली का व्यापार होता रहा है।

काशी में 4 से 5 ट्रक रोज खप रहा मॉल

मछली मार्केट के सूत्रों की मानें तो बनारस में आज भी प्रतिबंधित मांगुर की बड़ी खेप आ रही है। यही से एजेंट गाजीपुर, आजमगढ़ बलिया से बिहार तक मॉल भेजते है। लगभग 4 से 5 ट्रक मॉल प्रतिदिन बनारस में ही खप जा रहा। सवाल यह है कि जब प्रशासन व मत्स्य विभाग खुद सक्रिय होकर नजर रख रहा तो यह खेल आखिर कर कौन रहा है। कहीं न कहीं सिस्टम में छेद जरूर है जिससे प्रतिबंधित मांगुर आज भी देशी मछलियों व पर्यावरण के लिए गम्भीर खतरा बनी हुई है।

हुई थी शिकायत तो डीएम हुए थे सख्त

मछलियों के अवैध कारोबार की शिकायत पूर्व में जिलाधिकारी से हुई थी।इस पर डीएम ने सहायक निदेशक मत्स्य से जवाब तलब भी किया था। प्रतिबंधित मछलियों के अवैध कामों में शामिल लोगों पर किसी तरह की कार्रवाई नहीं होने पर सहायक निदेशक मत्स्य रवीन्द्र सिंह को आरोप पत्र जारी कर सात दिन में जवाब देने को भी कहा था।

जिलाधिकारी कौशल राज शर्मा ने सहायक निदेशक मत्स्य को जारी आरोप पत्र में पूछा था कि कि ग्राम रमना, ग्राम उंदी व कैंट स्थित बांग्ला नंबर-51 में अवैध रूप से मत्स्य व्यापार कैसे किया जा रहा है। इसी के बाद बड़ी कार्रवाई हुई थी। तब प्रतिबंधित थाई मांगुर मछलियों के विक्रेताओं के खिलाफ पुलिस कार्यवाही के बाद भी सहायक निदेशक मत्स्य ने अपने स्तर से कोई कार्यवाही नहीं की।
थाई मांगुर प्रजाति की मछलियों की बिक्री एवं प्रसार है प्रतिबंधित

जिलाधिकारी कौशल राज शर्मा ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा-144 के तहत थाई मांगुर प्रजाति की मछलियों की बिक्री और प्रसार को प्रतिबंधित किया है। उन्होंने आदेश दिया है कि मत्स्य बीज बाहर से लाकर वाराणसी में स्थित तालाबों में न तो कोई डालेगा और न ही ऐसा करने के लिए किसी को प्रेरित करेगा। कोई भी व्यक्ति थाई मांगुर प्रजाति की मछलियों की बिक्री वाराणसी में नहीं करेगा। थाई मांगुर मत्स्य प्रजाति के कारण प्रदेश में जल स्वास्थ्य पर खतरा है। यदि इन मछलियों के पालन को प्रतिबंधित नहीं किया गया तो जलीय वनस्पति एवं कई जलीय जीव जंतु समाप्त हो जाएंगे।

सबसे पहले केरल में लगा था बैन

इस मछली को वर्ष 1998 में सबसे पहले केरल में बैन किया गया था। उसके बाद भारत सरकार द्वारा वर्ष 2000 देश भर में इसकी बिक्री पर प्रतिबंधित लगा दिया गया था। यह मछली मांसाहारी है यह इंसानों का भी मांस खाकर बढ़ जाती है ऐसे में इसक सेवन सेहत के लिए भी घातक है इसी कारण इस पर रोक लगाई गई थी।” ऐसा बताते हैं, उत्तर प्रदेश मत्स्य विभाग के सूत्र बताते हैं कि ”इसका पालन बाग्लादेश में ज्यादा किया जाता है। वहीं से इस मछली को पूरे देश में भेजा जाता है। यह मछली पर्यावरण व अन्य मछलियों के लिए घातक तो है ही यह कैंसर का कारक भी है। इसीलिए यह जहां मिलती है वहां इसको मार कर गाड़ दिया जाता है।”

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