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जन्म और मृत्यु से महत्वपूर्ण जीवन है ,सारनाथ में चल रहे गुरु पूर्णिमा महोत्सव में उठी ज्ञान गंगा की लहर
वाराणसी। ध्यान योग जन जागृति सेवा संस्थान काशी सिद्धाश्रम के तत्वाधान में सारनाथ स्थित प्रांगण में गुरु पूर्णिमा महोत्सव के पांचवे दिन ज्ञान गंगा की लहर उठी तो भक्त आह्लादित हो उठे। आत्म ब्रह्म सिद्धि दीक्षा सत्संग साधना शिविर के पांचवे दिन सद्गुरु स्वामी कमलेश्वरानंद महाराज ने जीवन के संबंध में बड़ा ही महत्वपूर्ण संदेश …
 
जन्म और मृत्यु से महत्वपूर्ण जीवन है ,सारनाथ में चल रहे गुरु पूर्णिमा महोत्सव में उठी ज्ञान गंगा की लहर

वाराणसी। ध्यान योग जन जागृति सेवा संस्थान काशी सिद्धाश्रम के तत्वाधान में सारनाथ स्थित प्रांगण में गुरु पूर्णिमा महोत्सव के पांचवे दिन ज्ञान गंगा की लहर उठी तो भक्त आह्लादित हो उठे। आत्म ब्रह्म सिद्धि दीक्षा सत्संग साधना शिविर के पांचवे दिन सद्गुरु स्वामी कमलेश्वरानंद महाराज ने जीवन के संबंध में बड़ा ही महत्वपूर्ण संदेश दिया।

उन्होंने कहा सुनो सुनो मेरे आत्मनों सुनो ! कोई भी ”जीव” जब धरा पर आता है तो वो जीव नहीं बल्कि ”शिव” के स्वभाव में तल्लीन होता है। शिव रूपी आनंद से सराबोर हर पल ”आनंद” में गोता मारता है, प्रारंभिक क्रिया है । यह प्रतिपल बड़ा होता चला जाता है। उस जीव के ”तन-मन-प्राण” में परिवर्तन होने लगता है। वह जीव धीरे-धीरे ”परमात्मा” से दूर ,”स्व” से विलग और ”संसार” में लिप्त होता चला जाता है। उसका ”स्वभाव” था ”शिव-आनंद” उसे छोड़ सम्पूर्णता के साथ अपने ”स्वभाव” के विपरीत ध्रुव पर खड़ा हो जाता है।

इस कलिकाल में वह इतना डूब जाता है ”संसार” के नशे में कि ”सार”का ,”सत्य” का ,”शिव”का ख्याल भी नहीं रह जाता है। भीड़ में भेड़ की भांति शामिल हो अपने मन के अनुसार अपना ”संसार” जीने लगता है और जीते-जीते एक दिन ऊब ”परमात्मा” में विलीन होने की गुहार करने लगता है। पर ये स्थिति जीव के साथ तब निर्मित होती है जब वो असहाय हो जाता है। उसका अपना ”अस्तित्व” जिसे वो वर्षों से बनाया रहता है जब वो समाप्त हो जाता है। तब उसे ”संसार” से ”घृणा”होने लगती है। फिर वो एक बार तड़प उठता है क्योंकि वो अब अपने को निसहाय पाता है। फिर भी वो ”आनंद” जो वो लेके आया था, उससे कोसों दूर छूट गया रहता है।

उसके पास यदि कुछ होता है तो सिर्फ ”दुःख की गठरी” जिसे वो ”परमात्मा” को दे ”मुक्त” हो जाना चाहता है। यही जीव के जीवन का क्रम है। ऐसे ही हर ”जीव” ”जन्म”, ”जीवन” और ”मृत्यु” की डोर में बधा ”मुझ-आनंद” की ओर ही आता है । पर ”जन्म और मृत्यु” के बीच की घडी हर एक जीव के लिए सामान्य रूप से भटकाव का कारण बन जाता है ,क्योंकि इस समय में “ब्रह्म” पूर्णतः उसके रूप में ”चैतन्य” होता है। यहाँ ”चैतन्यता” का अर्थ ”ऊर्जा” से है, वो सब कुछ करने के योग्यता में रहता है।

उसी समय में वो जीव ब्रह्म-परमात्मा का साथ छोड़ सिर्फ ”संसार” का हो जीने लगता है और ”पाने” की जगह धीरे-धीरे सब खोता चला जाता है । मेरा यह संदेश जीव को स्मृति दिलाने हेतु की “परमात्मा” को कभी ना भूले जीव यह बताना चाहता हूँ । जन्म और ”मृत्यु” से महत्वपूर्ण ”जीवन” है ,इसलिए हर ”युवा”, हर ”बूढा”, परमात्मा” को अपने ”जीवन” का अंग बनाये और अपने जीवन को हर पल ”आनंद” में पाए । कार्यक्रम के ब्राह्मण महासभा वाराणसी के अध्यक्ष सतीश मिश्रा , प्रमुख संयोजक बादल सिंह, जय प्रकाश पटेल आदि, उपस्थित रहे।